श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ

‘‘आनो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः।’’
अर्थात्- सभी दिशाओं से हमारे पास अच्छे विचार आवें।

उत्प्रेरणा:

देववाणी संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है। पहले यह भारत की राष्ट्रभाषा थी। हमारे प्राचीनतम ग्रंथ, भगवत् गीता, पुराण आदि की भाषा भी संस्कृत ही है। संसार की समस्त भाषाओं का उद्गम भी संस्कृत से ही हुआ है। इसी की वर्णमाला पूर्णतया वैज्ञानिक है।

संस्कृत भाषा विशाल शब्द सामर्थ्य एवं विपुल अर्थ गांभीर्य से तथा विपुल वाड्मय से समृद्ध है, समय के प्रभाव से आज इसका प्रचार नगण्य हो चुका है। अतएव इसके पूर्व गौरव को पुनः स्थापित करने की महत्ती आवश्यकता है यद्यपि इसके उच्चारण में मधुरता, लिखने में सुन्दरता और पद लालित्य जैसा गुण अन्य किसी भाषा के पास नहीं है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत।।
ऐसी कल्याण कामना, राष्ट्रीय एकता एवं विश्वबंधुत्व का भाव और किस भाषा के पास है? वेदाध्ययन का विधिवत् अध्यापन कराने वाले निपुण-विद्वानों का आज नितांत अभाव होता जा रहा है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद के विषय-विशेषज्ञ पंडित जन सभी इस लुप्तप्रायः विज्ञान से क्षुब्ध हैं। विधि-विधान से यज्ञादि कराने की प्राचीन पद्धतियां समाप्त होती जा रही है यही कारण है कि अनेक यज्ञ-महायज्ञ होने पर भी उनका अभीप्सित फल प्राप्त नहीं हो पाता।
भारतीय संस्कृति के भव्य स्वरूप को अखण्डित रूप से विद्यमान रखने की दृष्टि से भी वर्तमान समय में वेदों का अनुशीलन परम आवश्यक है।

एतद्देश्य प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।।

इस देश में उत्पन्न हुए अग्रजन्मा (ब्राह्मणों, विद्वानांे) से पृथ्वी के लोग अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें।

इसी श्री श्रद्धा संस्कृत-विद्यापीठ के शुभारंभ की प्रेरणा इसलिए मिली कि आज के समय में अध्ययन-अध्यापन की विशिष्ट शाखाओं में पूर्णता की ओर छात्र-छात्राओं को ले जाया जा सके। यद्यपि ऐसी व्यवस्थाएँ दुष्कर हैं, तथापि असंभव नहीं, संबंधित वेदादि के विद्वानों को यहाँ लाना तथा रहने की व्यवस्थाएँ प्रदान करना, शिक्षार्थियों पर वित्तभार न डालते हुए समस्त आवासीय प्रबंधन निःसंदेह बहुत अर्थ साध्य है।

विशाल श्री श्रद्धा संस्कृत-विद्यापीठ आपके स्वागतार्थ तत्पर है, श्री नाथजी की महिमा से सारे कार्य सिद्ध होंगे इसमें जरा भी संदेह नहीं है। प्रवेशित विद्यार्थियों एवं संरक्षकों को इस अद्वितीय सुअवसर का लाभ भरपूर परिश्रम, लगन, निष्ठा एवं उत्साह के साथ उठाना चाहिए ताकि वे भारतीय संस्कृति के परीक्षण के साथ-साथ राष्ट्रोन्नति में भी सहायक भूमिका का निर्वहन कर सकें।

पीठाधीश्वर बैजनाथ जी महाराज

संकल्प:

  • भारतीय संस्कृति का संरक्षण।
  • नगरीय एवं ग्रामीण बालक-बालिकाओं को प्राचीन विलुप्तप्रायः वेदाध्ययन शास्त्र एवं व्यवहार ज्ञान, कर्मकाण्ड, ज्योतिष एवं व्याकरण के निष्णात विद्वान तैयार करना एवं देश के सांस्कृतिक गौरव का पुनः स्थापन करना।
  • विद्यार्थियों की शारीरिक, मानसिक एवं चारित्रित सामर्थ्य विकसित कर उनमें उच्च आदर्श गुणों को प्रतिष्ठित करना।
  • क्षेत्रीयता, जाति, धर्म एवं भाषा आदि से ऊपर उठकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को विकसित करना तथा आदर्श मानव का निर्माण करना।

संस्था का नाम:

इस संस्था का नाम श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ समिति, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) राजस्थान है।

संस्था का पता:

श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ, श्री श्रद्धापुरम, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) राजस्थान है।

संस्था का उद्देश्य:

श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ, समिति के अध्यक्ष श्री नाथ जी महाराज का आश्रम के पीठाधीश्वर श्री बैजनाथ जी महाराज है।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, धर्म एवं सामाजिक जागृति के लिए कार्य करना।
  • जाति, रंग, धर्म, लिंग, या आयु का भेद न रखते हुए संस्कृत साहित्य, व्याकरण, भारतीय प्राचीन धरोहर वेद, वेदांग, कर्मकाण्ड, ज्योतिष, वेदांत एंव अन्य विविध प्राचीन विधाओं का सांगोपांग अध्ययन करवाना।
  • सामाजिक, सांस्कृतिक, संगीत, नृत्य चित्रकला आदि विविध विधाओं का शिक्षण देना।
  • देश व समाज हित हेतु चिंतन एवं विचारों की प्रगति तथा ज्ञान-प्रसार हेतु व्याख्यान, वाद-विवाद, विचार-विमर्श, शैक्षणिक गोष्ठियां आदि का संगठन एवं प्रबंध करना।
  • भारतीय प्राचीन अक्षयनिधि वेद, ज्योतिष, आयुर्वेद, संस्कृत व्याकरण व अन्य धर्म वाडमय संबंधी रचनाओं का अनुसंधान करवाना।
  • वेद, वेदांत, संस्कृत व्याकरण, कर्मकाण्ड एवं ज्योतिष का उच्च स्तर का अध्ययन करवाना, इन विधाओं का प्रचार-प्रसार करवाना।
  • श्री नाथजी महाराज का आश्रम-ट्रस्ट, लक्ष्मणगढ़, सीकर राज. के डीड में वर्णित विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु योजनाएँ बनाना एवं उनको क्रियान्वित करना।
  • संस्था तथा संस्था की सम्पत्ति की उचित संभाल एवं सुरक्षा, अभिवृद्धि एवं विकास करना।
  • वेद-वेदांत, संस्कृत व्याकरण, कर्मकाण्ड एवं ज्योतिष आदि के सम्यक शिक्षण हेतु देश विदेश में ऐसी संस्कृत विद्यापीठ संचालित करना।

संस्था की कार्यकारिणी समिति:

  • श्री नाथजी महाराज का आश्रम-ट्रस्ट, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) के अधीन इस संस्था का संचालन एक कार्यकारिणी समिति करती है। इस कार्यकारिणी समिति के कम से कम 11 एवं ज्यादा से ज्यादा 15 सदस्य होते हैं।
  • कार्यकारिणी समिति में निम्न पदाधिकारी हैं:
    • अध्यक्ष
    • सचिव
    • संयुक्त सचिव
    • कोषाध्यक्ष
    • शेष अन्य सामान्य सदस्य
  • कार्यकारिणी का समय कम से कम 3 वर्ष होता है।
  • कार्यकारिणी समिति में यथासंभव सभी वर्गों के विद्वान एवं उदार समाजसेवी व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है।

कार्यकारिणी समिति के कर्तव्य एवं कार्य:

  • श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ, लक्ष्मणगढ़ के संचालन व्यवस्थापन एवं भौतिक विकास में ट्रस्ट-मण्डल का सहयोग करना।
  • श्री नाथजी महाराज का आश्रम-ट्रस्ट, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) द्वारा पारित संस्था संबंधी निर्णयों की अनुपालना करवाना।
  • श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ, लक्ष्मणगढ़ के सुचारू रूप से संचालन हेतु आर्थिक व्यवस्था जुटाने में ट्रस्ट-मण्डल का सहयोग करना।
  • संस्था के दैनिक आय-व्यय का हिसाब रखेगी तथा उस हिसाब को प्रतिमाह श्री नाथजी महाराज का आश्रम ट्रस्ट, लक्ष्मणगढ़ के अध्यक्ष को सौंपना।
  • संस्था के स्थायी संचालन हेतु आर्थिक अनुदान प्राप्ति के लिए चार प्रकार के सदस्यों की सदस्यता तैयार करना।
    • साधारण सदस्य- कम से कम 3100/- वार्षिक अनुदान दे सकेगा।
    • विशिष्ट सदस्य-कम से कम 5100/- वार्षिक अनुदान दे सकेगा।
    • अतिविशिष्ट सदस्य- कम से कम 11,000/- वार्षिक अनुदान दे सकेगा।
    • परमविशिष्ट सदस्य- कम से कम 21,000/- वार्षिक अनुदान दे सकेगा।
  • कार्यकारिणी की बैठकों की कार्यवाही संपादन का लेखा जोखा अपनी एक कार्यवाही पुस्तिका में दर्ज करना।
  • कार्यकारिणी वर्ष के प्रारंभ में प्रतिवर्ष शिक्षार्थियों पर होने वाले भोजन, वस्त्र व अन्य व्यय संबंधी राशि पर विचार एवं राशि का निर्धारण।
  • ट्रस्ट-मण्डल द्वारा नियुक्त अध्यापकों, कर्मचारियों आदि से संबंधी कार्य संपादित करवाने की व्यवस्था करवायेगी एवं निरीक्षण करेगी तथा कर्म कौशल मंे प्रवीणता लायेगी।
  • संस्था संबंधी मान्यताएँ, परीक्षाएँ आदि करवाने की जिम्मेदारी का निर्वाह करेगी।
  • मध्यावधि में कार्यकारिणी के रिक्त स्थानों की पूर्ति अपने बहुमत से करेगी।
  • संस्था में प्रवेश के इच्छुक शिक्षार्थियों की योग्यता-जाँच व चयन प्रक्रिया में अध्यक्ष का सहयोग करना।

श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ: श्रद्धापुरम्

परिचय:

शिक्षा मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है और मानव व्यक्तित्व के समग्र विकास का साधन है। यह सही है कि किसी भी शिक्षण संस्था का परिचय उसके द्वारा शिक्षित छात्र-छात्राएँ होते हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित करके संस्था को गौरवान्वित करते हैं, लेकिन श्रेष्ठ, पवित्र तथा उत्तम शैक्षिक वातावरण, सुविधापूर्ण भवन, विद्वान शिक्षकजन, ऊँचा लक्ष्य एवं स्वस्थ प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है, जो विद्यार्थियों को उनके लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होता है।

सद्य स्थापित वेद-विद्यालय शेखावाटी के समस्त उत्तम एवं प्रसिद्ध शिक्षण-स्थलों में शीघ्रता से उभर कर अपने भव्य परिसर, भवनों, उद्यानों एवं विद्यार्थियों को दी जाने वाली उत्तम शिक्षा, सुविधाओं के कारण दूर-दूर तक सुविख्यात हो गया है यह परिसर जितना भव्य और मनोरम है उतना ही सुविधा जनक भी।

‘‘बाल्यकाल जीवन का प्रातःकाल है अतएव बचपन में प्राप्त शिक्षा महान व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक बनती है।’’
बसंत पंचमी दिनांक 25 फरवरी, 2002 का दिन श्री संस्कृत विद्यालय के इतिहास में अविस्मरणीय है जिस दिन इसका शिलान्यास महाराज श्री बैजनाथ जी के कर कमलों द्वारा हुआ। प्रदूषण रहित वातावरण शांत और संुदर है तथा अध्ययन के लिए उपयुक्त है। शांत, एकांत वातावरण अध्ययन पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायक होता है। श्री श्रद्धापुरम् इसका एक अनूठा उदाहरण है। सुविस्तृत विद्यालय भवन भी श्री श्रद्धानाथ आश्रम के ठीक सामने अवस्थित है। मुख्यद्वार में प्रवेश करते ही सम्मुख ऊपर की मंजिल में भव्य वेद मंदिर बीच में सुशोभित है जिसका उत्तुंग शिखर मानो आज के संस्कारहीन वातावरण में वेद संस्कृति की पुनर्स्थापना का उद्घोष कर रहा है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संुदर प्रतिमाएँ हैं। इस मुख्य मंदिर के दोनों और वेद, कर्मकाण्ड, ज्योतिष की प्रयोगशालाएँ हैं जिनके नीचे वृहत् कक्षा कक्ष हैं।

दाहिनी ओर सर्वप्रथम प्राचार्य कक्ष गोलाकार में निर्मित है जहाँ के वातायनों से चारों ओर का निरीक्षण किया जा सकता है। इसके आगे पंक्ति में छात्रों के निवास हेतु सात कमरे हैं मुख्यद्वार के बांयी ओर ठीक प्राचार्य कक्ष के समक्ष गोलाकार प्रशासक कक्ष है जिसकी एक पंक्ति में कक्षा कक्ष तथा दूसरी ओर प्राचार्य एवं शिक्षकों के निवास बने हुए हैं।

मुख्यद्वार के बांयी ओर निरीक्षण कक्ष (कंट्रोलरूम) ड्राइंग पेंटिंग, संगीत, डिस्पेन्सरी, कम्प्यूटर कक्ष, जलगृह तथा दो भंडार गृह आदि बने हुए हैं।

एक आदर्श शिक्षा संस्थान के रूप में आश्रम द्वारा श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ के नाम से एक शैक्षणिक संस्था चल रही है। इस संस्था में प्राचीन संस्कृत वांड्मय तथा आधुनिक शिक्षा पाठ्यक्रम का सुन्दर समन्वय है। यह एक आवासीय विद्यापीठ है। यह संस्था आठवीं तक चल रही है। इसमें लगभग 40 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। वे सभी विद्यार्थी उत्तरी राजस्थान के कुछ जिलों के हैं। इनमें सीकर, झुन्झुनू, चूरू, बीकानेर, नागौर आदि जिले सम्मिलित हैं। प्रवेशिका की मान्यता के लिए प्रयास चल रहा है। आशा है शीघ्र ही प्रवेशिका तक की मान्यता प्राप्त कर ली जाएगी। इस विद्यापीठ में गरीब एवं पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी काफी संख्या में हैं। इनमें अधिकांश विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि देहात है। इस विद्यापीठ में कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। यहाँ पूर्णतया निःशुल्क शिक्षा दी जाती है।

इस विद्यापीठ के संबंध में कुछ सामान्य परिचय देना बहुत आवश्यक है। अतः इस संस्था के विवरणिका के अनुसार कुछ सामान्य सा परिचय उल्लेखित कर रही हूँ।

उल्लेखनीय विशेषताएँ

  • श्री श्रद्धा संस्कृत विद्यापीठ सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ तहसील के पश्चिमी छोर पर स्टेशन के निकट सुन्दर शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध श्री श्रद्धा नाथ आश्रम के सम्मुख स्थित है, जहाँ का सुरम्य प्राकृतिक परिवेश सहज मन को लुभाने वाला है।
  • यह विद्यापीठ सावासी संस्था है, जिसका वृहत छात्रावास सम्पूर्ण सुविधा सम्पन्न है, संस्था परिसर ‘श्रद्धापुरम्’ में ही समस्त कार्यकर्ता भी निवास करते हैं।
  • मुख्यतः निम्न एवं मध्यम आयवर्ग परिवार के विद्यार्थियों के लिए शिक्षा प्राप्ति का यह उत्तम संस्थान है।
  • गाँव एवं शहर की आबादी से दूर प्रकृति की खुली गोद में अवस्थित श्रद्धापुरम् परिसर सभी प्रकार के प्रदूषणों से रहित है।
  • सुयोग्य विषय निपुण शिक्षकों द्वारा शिक्षण एवं शिक्षक-शिक्षार्थी का आत्मीय संबंध इसकी अपनी विशेषता है।
  • सुव्यवस्थित अनुशासित दिनचर्या अध्ययन में विशेष सहायक है।
  • उउत्तम परीक्षा परिणामों के साथ-साथ शिक्षार्थियों में आस्था, श्रमनिष्ठा, समभाव एवं श्रद्धा आदि जीवन मूल्यों का विकास विद्यापीठ का परम लक्ष्य है।
  • खेलकूद, स्वस्थ्य मनोरंजन, व्यायाम, योग, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विविध साहित्यिक गतिविधियों की विशेष व्यवस्था यहाँ है। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ विद्यापीठ का मूल मंत्र है।
  • वर्ष मंें एक बार अभिभावक-शिक्षक सम्मेलन अनिवार्य रूप से आयोजित होता है।

स्थापना दिवस

माघ शुक्ल त्रयोदशी सोमवार संवत् 2058 तदनुसार 25 फरवरी, 2002 ई. को शिलान्यास पीठाधीश्वर श्री बैंजनाथ जी महाराज के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।

पाठ्यक्रम:

सामान्य अध्ययन:
  • कक्षा-छठी- राजस्थान शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रमानुसार।
  • कक्षा सातवीं-राजस्थान शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रमानुसार।
  • कक्षा आठवीं-राजस्थान शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रमानुसार।
ऐच्छिक विषय
  • संस्कृत, व्याकरण, वेद, कर्मकाण्ड, ज्योतिष आदि।
  • ऐच्छिक विषयों का चयन विद्यार्थियों एवं संरक्षक की अभिरूचि व विद्यार्थी की प्रतिभानुसार किया जाता है।
पाठ्येत्तर प्रवृत्तियाँ
  • विशेष शिक्षण-अंग्रेजी भाषा लेखन एवं प्रयोग।
  • कम्प्यूटर-सामान्य अध्ययन अनिवार्य।
  • संगीत(गायन,वादन)
  • चित्रकला
  • योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा का सामान्य ज्ञान।
  • आयुर्वेद, होम्योपैथी चिकित्सा का सामान्य ज्ञान।
  • भाषण, निबंध, वाद-विवाद, अभिनय, नृत्य, गायन, वादन, सिलाई, कढ़ाई, रंगोली, मांडना, मेंहदी आदि प्रतियोगिताएँ।

खेलकूद

छात्रों के लिए
  • बास्केट बाल
  • हैण्डबाल
  • मलखम्भ
  • कुश्ती
  • योगिक व्यायाम
  • पी.टी. परेड
  • जूड़ो कराटे
छात्राओं के लिए
  • हैण्डबाल
  • रिंगबाल
  • बैडमिन्टन
  • लेजिम
  • योगिक व्यायाम
  • पी.टी. परेड
  • जूड़ो कराटे

प्रवेश नियम

  • पाँचवीं पास, न्यूनतम प्राप्तांक 60 प्रतिशत।
  • प्रवेश लिखित परीक्षा की योग्यता सूची के आधार पर।
  • मौखिक साक्षात्कार, अभिरूचि एवं योग्यता परीक्षण के आधार पर।
  • संरक्षक साक्षात्कार आवश्यक।
  • विद्यार्थियों को गणवेश में रहना अनिवार्य।
  • विद्यार्थियों से कोई शिक्षण शुल्क नहीं लिया जाता है।
  • आवास शुल्क पूर्णतया माफ।
  • विद्यार्थियों को निःशुल्क पुस्तकें प्रदान रकने की व्यवस्था।
  • मौसम के अनुसार पहनने के वस्त्र एवं ओढ़ने बिछाने के विस्तर स्वयं लाने अनिवार्य।
  • परीक्षा व परीक्षा परिणाम संबंधी शिक्षा विभागीय नियम पूरी तरह लागू होते हैं।

अन्य गतिविधियाँ:

विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास के लिए विद्यापीठ गतिविधियों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। जिससे शैक्षिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, नैतिक एवं समाज सेवा आदि के प्रति दत्तचित्तता आवश्यक रूप से बन सके।
  • प्रतिदिन की प्रार्थना सभा में ईश्वर वंदना, सूक्ति वाक्य प्रेरक प्रसंग, देशभक्ति से ओत-प्रोत गीत, ध्यान एवं मौन प्रार्थना, सामान्य ज्ञान, दैनिक समाचार, आवश्यक दिशा निर्देश, प्रतिज्ञाएँ एवं राष्ट्रगान आदि कार्यक्रम नैतिक संस्कारों एवं साधारण ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • प्रतिदिन स्वच्छता का निर्वहन एवं स्वच्छ व्यवहार की जाँच की जाता है।
  • सामूहिकता एवं समभाव बढ़ाने के लिए बिना किसी जाति-पाँति के भेदभाव के एक साथ रहना।
  • अभिभावक सम्मेलन एवं सम्पर्क द्वारा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर चर्चा-परिचर्चा।
  • उत्तरदायित्व की भावना को बढ़ावा देने के लिए बालक-बालिकाओं को विद्यापीठ एवं छात्रावास में विभिनन उत्तरदायित्व सौंपना।
  • सत्रारंभ से ही योजनाबद्ध कार्यक्रम(पंचाग) की रचना एवं उसी के अनुसार वर्ष भर के कार्यों का क्रियान्वयन।
  • प्रति शनिवार को साहित्यिक, सांस्कृतिक, वाद-विवाद एवं विचार गोष्ठियों का आयोजन।
  • शैक्षिक भ्रमण।
  • विभिन्न शारीरिक व्यायाम, खेलकूद, प्रतियोगिताओं एवं सामूहिक खेल प्रदर्शन जिनमें सभी को भाग लेना अनिवार्य।
  • समय-समय पर महापुरूषों, संतों के अमृत वचनों से विद्यार्थियों को लाभांवित करना।
  • खेलकूद उत्तम स्वास्थ्य के निमित्त:
    • प्रतिदिन खेलना अनिवार्य है। ‘‘स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क का निवास संभव है।’’
    • व्यायाम के विभिन्न साधन एवं विस्तृत खेल मैदान उपलब्ध है।

    श्री श्रद्धा-छात्रावास




    श्री नाथजी के आश्रम के पीठाधीश्वर श्री बैजनाथ जी महाराज ने अपने परम पूज्य श्रद्धेय गुरू श्री श्रद्धानाथ जी द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलते हुए जब समाजसेवा एवं समाज कल्याण के मार्ग पर अग्रगसित हुए तब उन्होंने श्री श्रद्धासंस्कृत विद्यापीठ की स्थापना की एवं उसे और अधिक सार्थक बनाने के लिए श्रद्धा छात्रावास की भी स्थापना की जिससे वे गरीब एवं निम्न या मध्यम परिवारों के बच्चों को सुशिक्षित कर सकें। उदारमना, धर्म परायण, कर्मठ एवं दूरदर्शी श्री बैजनाथ जी की धर्म, दर्शन, कला, संगीत, साहित्य, खेल-कूद में विशेष रूचि रही अतः विद्यापीठ एवं छात्रावास में उन्होंने सभी विधाओं की योजना निःशुल्क रूप में प्रदान करने की चेष्ठा की।

    विद्यापीठ में अध्ययनरत एवं छात्रावास में रहने वाले गरीब विद्यार्थियों को पहनने के कपड़े एवं ओढ़ने बिछाने के कपड़े निःशुल्क दिए जाते हैं। गरीब विद्यार्थियों को पुस्तकें, कॉपियाँ तथा अन्य स्टेशनरी भी निःशुल्क उपब्ध कराई जाती है।

    गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति, आर्थिक सहयोग, परामर्श एवं मार्गदर्शन:
    • श्री नाथजी महाराज के आश्रम द्वारा गरीब, प्रतिभावान विद्यार्थियों को बिना किसी जाति एवं वर्गभेद के हजारों रूपये की छात्रवृत्ति अध्ययन हेतु बिना किसी प्रचार एवं प्बलिसिटी के दी जाती है।
    • ऐसे विद्यार्थियों को अध्ययन हेतु उचित मार्गदर्शन एवं प्रवेशादि में उचित सहयोग भी दिया जाता है।
    • विद्यापीठ के विद्यार्थियों को निरंतर उनके उच्च अध्ययन हेतु या रोजगार संबंधी जानकारी या समस्या निवारण हेतु उचित परामर्श एवं मार्गदर्शन दिया जाता है।
    • आश्रम से सहायता प्राप्त सैकड़ों विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानपूर्ण पदों पर आसीन हैं।
    • सुदूर पर्वतीय प्रदेशों में निवास करने वाली जन जातियों को आश्रम ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष कम्बल, रजाई, स्वेटर आदि वितरित किए जाते हैं।
    • पर्वतीय अँचलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उनके नाप के अनुसार एवं मौसम के अनुसार कपड़े वितरित किए जाते हैं।
    चिकित्सा सुविधाएँ
    उत्तम स्वास्थ्य की दृष्टि से चिकित्सा सुविधाएँ भी उपलब्ध है। चिकित्सक समय-समय पर शिक्षार्थियों के स्वास्थ्य परीक्षण हेतु आते रहते हैं।

    आश्रम पुस्तकालय

    ‘‘विद्या प्राप्यते सौख्यं यशः कीर्तिस्तथातुला।
    ज्ञानं स्वर्गः सुमोक्षश्च तस्माद्विद्यां प्रसाधप।।’’
    -पद्मपुराण

    ‘‘विद्या से सुख, यश, अतुलित कीर्ति, ज्ञान, स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः विद्या की साधना करो।’’

    विद्या साधना में पुस्तकालय की अहम् भूमिका होती है इस दृष्टि से पीठाधीश्वर श्री बैजनाथ जी महाराज द्वारा आश्रम में एक विशाल पुस्तकालय ‘‘प्रज्ञान मंदिर’’ बनवाया गया। उच्च शिक्षा प्राप्त जिज्ञासु अध्यवसायी, साहित्य सेवी बैजनाथ जी की विशेष अभिरूचि है उच्च स्तरीय ग्रंथों का अध्ययन करना इसी कारण आश्रम के पुस्तकालय में भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, कला, संस्कृति संबंधी पुस्तकें एवं भारत के सभी पंथों के संत महात्माओं की दुर्लभ एवं अति महत्वपूर्ण जीवनियां हैं। कई दुर्लभ हस्तलिखित पुस्तकें हैं।

    यह पुस्तकालय दो मंजिलों में निर्मित है जिसमें 65 अलमारियाँ दीवारों में बनी हुई हैं। इस पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की 6000 पुस्तकें उपलब्ध है, इस पुस्तकालय की व्यवस्था एक स्वतंत्र पुस्तकालय अध्यक्ष पार्ट टाइम चलाता है। पुस्तकालय का उपयोग स्थानीय अध्यापक एवं बच्चे ही नहीं कर रहे हैं। अपितु बाहर से आए हुए जिज्ञासु पाठक भी अध्ययन करते हैं। पीएच.डी. और डी.लिट् करने वाले विद्यार्थी भी अपने अनुसंधान हेतु पुस्तकों से रेफ्रेंस लेकर जाते हैं।

    पीठाधीश्वर श्री बैजनाथ जी महाराज द्वारा पुस्तकालय के संकलन को निरन्तर बढ़ाने का प्रयास रहता है क्योंकि उनकी दृष्टि में यह सरस्वती का एक अपूर्व कोश है।

    अपूर्वः कोडपि कोशोडयं विद्यते तव भारति व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति संचयात्’’ हे सरस्वती! तुम्हारा (विधा का) कोश बड़ा विचित्र है अपूर्व है जो व्यय करने से बढ़ता है और यत्न से छिपाकर रखने से घटता है।

    पुस्तकालय नियम

    विद्यापीठ पुस्तकालय भवन विद्यापीठ के सम्मुख श्री श्रद्धानाथ आश्रम में अवस्थित है। जिसमें अत्यन्त महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ, विविध विषयों से संबंधित विपुल साहित्य, वेद, स्मृति, उपनिषद, संस्कृत, हिन्दी वाङ्मय, राजस्थानी, अंग्रेजी तथा धार्मिक ग्रंथ लगभग सभी हैं। छात्र-छात्राएँ जिनका विशद् अध्ययन करके अपने ज्ञान में अभिवृद्धि कर सकते हैं।
    पुस्तकालय ज्ञान का अक्षुण्य कोष है। कहा गया है ‘‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’’ श्रद्धा एवं विश्वास के साथ किया गया अध्ययन मनन, जीवन परिष्कृत परिमार्जित और सुसंस्कारिता करता है। संस्कार और ज्ञान जीवन की बहुत बड़ी शक्ति है।
    ‘‘नोलेज इज पॉवर’’ का मूलमंत्र मनुष्य को सफलता प्रदान करता है।
    • स्वाध्याय ज्ञान की प्राप्ति की कुंजी है विद्यार्थियों को गुरूजनों से संदर्भ ग्रंथों के नाम पूछा कर उन्हें पुस्ताकलय में बैठकर संबंधित अंश नोट कर लेने चाहिए।
    • पुस्तकालय से पुस्तकें निर्गत नहीं की जाएगी।
    • यदि पुस्तक के पृष्ठ फटे हों अथवा पृष्ठ कम हों तो पुस्तकालयाध्यक्ष को तुरंत सूचित करना चाहिए।
    • आरक्षित पुस्तकें, पुराने प्रश्न-पत्र, पाठ्यक्रम तथा अन्य पुस्तकें विद्यार्थियों को वाचनालय में ही बैठकर पढ़ने की अनुमति मिलेगी।
    • पुस्तकालय एवं वाचनालय में शांतिपूर्वक अध्ययन करना अवश्यक है। अनुशासन भंग करने अथवा नियमों का पालन न करने की स्थिति में पुस्तकालय लाभ से वंचित किया जा सकता है।
    • पुस्तक खो जाने पर पुस्तक की दुगुनी कीमत वसूल की जाएगी।
    • अवकाश के दिन भी पुस्तकालय में अध्ययन किया जा सकता है।

    उत्सव

    • शिवरात्रि
    • श्रीश्रद्धानाथ जी महाराज की पुण्यतिथि
    • गुरू पूर्णिमा
    • राम नवमी
    • कृष्ण जन्माष्टमी
    • स्वाधीनता दिवस
    • गणतंत्र दिवस
    • गीता जयंती
    • संस्कृत दिवस
    • स्थापना दिवस
    ‘‘काकचेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा तथैव च
    अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्।’’

    फोटोगैलेरी

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